शुक्रवार, ९ ऑक्टोबर, २०२६

ख़ामोशी की ज़ुबान

ख़ामोशी की ज़ुबान

ख़ामोशी की ज़ुबान समुंदर जैसी होती हैं
उपरी सतह पर शांत, अंदर गहरी होती हैं

कौन समझ पाया आजतक गहराई उसकी
जीतनी हो कोशिश,रेत उतनी फिसलती हैं

ज्वार भाटा वक्त वक्त का अनोखा बदलाव
मौजूदगी उसकी, मन मश्तिष्क हिलाती हैं

उंची उडान,मन की गहराई दोनों साथसाथ
दिगंत और क्षितिज दोनों एक बात होती हैं 

बहका लो, चाहें जीतना तुम अपने मनकों
प्रकृति का एक उसुल,वो सब समा लेती हैं

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©शिवाजी सांगळे 🦋 papillon
संपर्क: +९१ ९५४५९७६५८९

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