बुधवार, १ एप्रिल, २०२६

दो स्वरूप























दो स्वरूप 

है सारा मनगढंत खेल
ईश्वर और मानव
प्रकृति को भुलाकर हमारा मेल !

कहां है दोनों का मेला
सुरज और चंद्रमा
रात का अंधेरा दिन का उजाला !

कहां टिकता है ठाँव
आस्था एवं विश्वास
गहराता है, दुविधा में मनोभाव !

कौन पुर्णरुप स्वरूप
ईश्वर और मानव
एक मे ही हैं बसें दोनों ये रूप !

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©शिवाजी सांगळे 🦋 papillon
संपर्क: +९१ ९५४५९७६५८९

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